स्वार्थी दैत्य : The Selfish Giant


स्वार्थी दैत्य : The Selfish Giant 
(Oscar Wilde 1854-1900) Translator : Jogendra Singh (08-04-2011)

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हर दोपहर स्कूल से आने के पश्चात छोटे बच्चे विशाल दैत्य के बगीचे में खेला करते थे !

नरम हरी घास के साथ यह एक बड़ा सुंदर प्यारा बगीचा था ! घास पर यहाँ वहाँ खूबसूरत फूल गगन में चमकते सितारों की तरह खड़े थे ! वहीं बारह आडू के दरख़्त खड़े थे, वसंत काल में जिनके गुलाबी और मौक्तिक (मोती) से नाज़ुक पुष्प फूटने लग पड़ते थे, और शरद ऋतु में जिनके फलों के बौर पकने लगते थे ! इसकी शाखाओं पर बैठ चिरैया का गाया गीत इतना मधुर होता था कि उसे सुनने के लिए बच्चे अकसर अपना खेल रोक दिया करते थे ! आपस में जोश के साथ बतियाते  "कितना अच्छा लगता है ना यहाँ !"

एक दिन दैत्य वापस आ गया ! वह अपने राक्षस मित्र कोर्निश के पास रहने गया हुआ था और पिछले सात बरसों से अपने उसी मित्र के पास था ! सात वर्षों की समाप्ति पर उसने उससे सब बातें की ! उसकी बातचीत सीमित थी और तब उसने अपने महल लौट जाने का निश्चय कर लिया ! वापस आने पर वह क्या देखता है कि बच्चे उसके बगीचे में खेलने में मशगूल हैं !

"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो" वह बड़ी कर्कश आवाज में चिल्लाया और बच्चे डरकर भाग गये !

"ये बगीचे मेरे अपने हैं" दैत्य बोला ! "इस बात को कोई भी समझ सकता है, और मैं अपने सिवा को भी यहाँ खेलने की अनुमति नहीं दूँगा !" अतः उसने बगीचे के चारों ओर एक ऊँची दीवार बनायीं और तख्ती पर लिखकर सूचना टांग दी !

"अनाधिकृत प्रविष्ट होने वालों पर मुकदमा चलाया जाएगा !"

वह एक बहुत ही स्वार्थी दैत्य था !

बेचारे गरीब बच्चों के पास खेलने के लिए अब कोई स्थान नहीं था ! उन्होंने सड़क पर खेलने की कोशिश की परन्तु सड़क कठोर पत्थरों एवं धूल से भरी हुई थी और वे इसे पसंद नहीं कर पाए ! अपनी कक्षाओं के पश्चात उस ऊँची दीवार के गिर्द भटकते और भीतर के खूबसूरत बगीचे के बारे में चर्चायें करते रहते थे !  एक दूसरे से वे कहते "वहाँ कितने खुश थे हम सब !"

फिर वसंत आया और यहाँ-वहाँ पूरे देश में छोटी चिडियाएँ थीं और नन्हे-2 फूल खिल उठे ! केवल स्वार्थी दैत्य के बगीचे में अब तक सर्दी का ही मौसम था ! चिड़ियों ने वहाँ गाना नहीं चाहा कि वहाँ कोई बच्चा नहीं था और पेड फूल खिलाना भूल गए ! एक बार एक खूबसूरत फूल ने घास के बीच से अपना सर निकाला, लेकिन जैसे ही उसने नोटिस बोर्ड को देखा उसे बच्चों के लिए बेहद दुख हुआ, और अपना निकला सर उसने फिर से घास में सरका लिया ! और जो खुश थे, वे थे हिमपात और तुषार (ओस) ! वे चिल्लाये "वसंत अवश्य इस बगीचे को भूल गया है ! इसलिए हम यहाँ पूरे वर्ष भर रहेंगे !" हिमपात ने अपने महान लबादे से घास को ढँक लिया, और ओस ने सभी पेड़ों को चांदी से पोत दिया ! उन्होंने उत्तरी हवा को भी आमंत्रित कर लिया, और वह आ गयी ! फरों से लिपटकर वह आयी और सारे दिन बगीचे में गरजती फिरी ! उसने चिमनी के बर्तन को उड़ा कर नीचे गिरा दिया ! "यह एक रमणीय स्थल है, "उसने कहा, "हमें ओलावृष्टि को भी बुला लेना चाहिए !" अतएव ओलावृष्टि भी आ गया ! हर दिन तीन-3 घंटों तक उद्विग्न होकर महल की छतों की पत्थर की पट्टियां पर बरसते हुए उनमें से अधिकतर को उसने तोड़ डाला ! उसके बाद वह पूरे बगीचे में जितनी तेजी से संभव हुआ उतनी तेजी से गोल-2 भागने लगा ! वह धूसर रंग (ग्रे) से सजा था और उसकी साँसें बर्फ की तरह ठंडी थीं !

"मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, इस बार वसंत के आने में इतनी देरी क्यों हो रही है ?" स्वार्थी दैत्य ने सोचा ! वह खिडकी में बैठा बाहर अपने ठन्डे सफ़ेद बगीचे को देख रहा था ! "मुझे आशा है जल्द ही इस मौसम में परिवर्तन आयेगा !"

लेकिन वसंत कभी नहीं आया, ना ही गर्मी आयी ! शरद ऋतु ने हर बगीचे में सुनहरा फल दिया, परन्तु दैत्य के बगीचे में उसने कुछ नहीं दिया ! "वह बहुत अधिक स्वार्थी है" ऐसा शरद ने कहा ! अतएव वहाँ हमेशा सर्दी थी ! उत्तरी हवा, ओलावृष्टि, तुषार (ओस) और हिमपात पेड़ों को माध्यम बना नृत्य करने लगे !

एक सुबह दैत्य के कानों में मधुर संगीत पड़ा तो वह अपने बिस्तर में नींद से जाग पड़ा !

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यह इतना ही कर्ण प्रिय था कि उसने सोचा ज़रूर यहाँ से राजा के संगीतकार निकल रहे होंगे ! वास्तव में यह केवल एक लिनेट पक्षी था जो खिडकी के बाहर गा रहा था ! लेकिन ऐसा बहुत समय के बाद था जबकि अपने बगीचे में उसने किसी चिड़िया को गाते सुना, इसलिए यह उसे संसार का सबसे मधुरतम संगीत लगा ! तब ओलावृष्टि ने उसके सर पर नाचना बंद कर दिया, और उत्तरी हवा ने भी अपनी गर्ज़न रोक दी, और एक मनभावन खुशबु का झौंका खुली खिडकी के माध्यम से उस तक आया ! "मेरा मानना ​​है कि वसंत पिछले द्वार पर आ गया है " दैत्य बोला साथ ही वह बिस्तर से कूदा और बाहर देखने लगा !

वह बाहर क्या देखता है ?

उसने देखा एक सबसे अद्भुत दृश्य ! बगीचे की दीवार में बने एक छोटे से छेद से रेंगकर भीतर आये छोटे बच्चे पेड की शाखों पर बैठे हुए हैं ! बच्चों को वापस आया पाकर पेड बेहद प्रफुल्लित हैं और इस वजह से उन्होंने स्वयं को फूलों से ढाँप लिया है ! और अपनी बाँहें (टहनियाँ) बच्चों के सिरों पर कोमलता से लहरा रहे हैं ! चिडियाएँ खुशी के मारे चहचहाती हुई यहाँ-वहाँ उडती फिर रही थीं और घास में से सर निकालकर छोटे फूल ऊपर देखते हुए हँस रहे थे ! यह समूचा नयनाभिराम (आँखों को भा जाने वाला) परिदृश्य बड़ा खूबसूरत था ! केवल एक कौने में शरद ऋतु अब भी वहाँ मौजूद थी ! यह उद्यान के सुदूर कोने में था, और इसमें एक छोटा लड़का खड़ा था ! वह इतना छोटा था कि पेड की शाखाओं तक नहीं पहुँच पा रहा था और वह इसके चारों ओर मंडराता फिर रहा था और धाड़ें मारकर रो रहा था ! बेचारा पेड अब भी ठंडी ओस और बर्फ़बारी से घिरा हुआ था और इसके ऊपर उत्तरी हवाएँ गरजती हुई बह रही थीं ! "ऊपर चढो ! छोटे लड़के" पेड ने कहा, साथ ही अपनी शाखाओं को जितना संभव हुआ उतना नीचे की ओर झुका दिया, लेकिन लड़का बहुत छोटा था !

इसे देख दैत्य का ह्रदय पिघल गया ! "इतना स्वार्थी कैसे हो गया मैं" उसने कहा; "अब मैं जान गया हूँ, अभी तक वसंत क्यों नहीं आया था ! मैं उस गरीब बच्चे को पेड के शीर्ष पर बिठाऊँगा, और फिर दीवार गिरा दूँगा और मेरा बगीचा हमेशा-2 के लिए बच्चों के खेलने का मैदान बन जायेगा !" अब तक जो कुछ कर चुका था उसके लिए उसे वास्तव में बड़ा खेद महसूस हो रहा था !

इसलिए उसने दबे पाँव सीढियों से नीचे उतरकर काफी धीरे से दरवाज़ा खोला और बगीचे में गया ! लेकिन जब बच्चों ने उसे देखा तो चूँकि वे उससे अत्यधिक भयभीत थे अतः सारे दूर भाग गए और फिर से बगीचे में सर्दी व्याप्त हो गयी ! केवल छोटा लड़का नहीं भगा क्योंकि उसकी आँखें आँसुओं से इतनी तर थीं कि उसे आता हुआ भीमकाय दैत्य दिखायी ही नहीं दिया ! दैत्य आकर उसके पीछे खड़ा हो गया और उसने बच्चे को कोमलता से अपने हाथों में उठाकर ऊपर पेड पर बिठा दिया और इसके साथ ही पेड पर एक ही बार में बौर (फूलों का खिलना) छा गया, और चिड़िया ने इस पर आकर अपना गाना शुरू कर दिया ! और छोटे बालक ने अपनी दोनों बांहों को फैलाकर दैत्य के गले को उनमें भर लिया और उसे चूम लिया ! जब अन्य बच्चों ने देखा कि दैत्य अब दुष्ट नहीं रहा तो वे भी वापस लौट आये और उनके साथ ही वसंत भी लौट आया ! "छोटे बच्चों, अब यह तुम्हारा बगीचा है" दैत्य ने कहा, और इसी के साथ उसने एक विशालकाय कुल्हाड़ी लेकर दीवार को नीचे गिरा दिया ! दोपहर को लोग बारह बजे जब बाज़ार को जाने लगे तो उन्होंने बच्चों के साथ दैत्य को सबसे सुन्दर बगीचे में खेलते पाया ! ऐसा सुन्दर बगीचा जोकि उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था !

बच्चे सारे दिन खेले, और शाम को वे दैत्य के पास उसे अलविदा कहने आये !

दैत्य : "लेकिन तुम्हारा छोटा साथी कहाँ है ? वह बच्चा जिसे मैंने पेड पर बिठाया था !" दैत्य को वह सबसे अधिक प्यारा था कि उसने उसे चूमा था !

"हम नहीं जानते" बच्चों ने ज़वाब दिया ! "वह कहीं दूर चला गया है !"

"तुम लोग कल यहाँ आने के लिए निश्चित ही उसे बताना और खेलने के लिए कल फिर आओ" दैत्य ने कहा ! लेकिन बच्चों ने कहा वे नहीं जानते कि वह कहाँ रहता है, और उससे पहले उसे कभी देखा भी नहीं था ! यह सुनकर दैत्य बहुत उदास हो गया !

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हर दोपहर, जब स्कूल से छुट्टी होती तब सारे बच्चे आकर दैत्य के साथ खेलते ! परन्तु छोटा बच्चा जिसे दैत्य ने चाहा था, कभी नज़र नहीं आया ! दैत्य सभी बच्चों के लिए बहुत दयालु था मगर अब भी बड़ी लालसा के साथ उसे अपने पहले छोटे दोस्त का इंतज़ार था, और अकसर उसके बारे में बात करता था ! "कैसे उसे मैं देख पाउँगा" ऐसा वह कहा करता !

सालों बीत गये ! दैत्य काफी बूढा और कमजोर हो चुका था ! अब वह और अधिक नहीं खेल सकता था, इसलिए अपनी आरामकुर्सी पर बैठ कर बच्चों को खेलते हुए देखता और आपने बगीचे की प्रसंशा किया करता ! "मेरे पास बहुत से खूबसूरत फूल हैं" वह कहता ! "लेकिन सबसे अधिक सुन्दर फूल बच्चे हैं !"

सर्दियों की एक सुबह तैयार होकर उसने अपनी खिड़की से बाहर देखा ! अब उसे सर्दी से नफरत नहीं थी, उसे पता था कि वसंत के लिए यह महज़ एक नींद है और यह कि अभी फूल आराम कर रहे हैं !

एक सुबह वह अपनी खिडकी के पास खड़ा बाहर देख रहा था कि अचानक उसने आश्चर्य से अपनी आँखें मलीं और सामने देखा, फिर देखता ही रह गया ! यह निश्चित रूप से एक अद्भुत दृश्य था ! उद्यान के सुदूरवर्ती कोने में एक पेड बहुत सुन्दर सफ़ेद फूलों से ढंका हुआ था ! इसकी सभी शाखाएँ सुनहरी और उन पर चाँदी के फल लटक रहे थे, और इसके नीचे खड़ा था वह छोटा लड़का, जिसने उसे प्यार किया था !

बेहद खुश दैत्य सीढियों से नीचे भागा और बाहर बगीचे में निकल गया ! तेजी से उसने घास का मैदान पार किया, और बच्चे के पास आया ! जैसे ही वह बिलकुल करीब आया उसका चेहरा गुस्से से लाल भभूका हो गया, और वह बोला : "किसने तुम्हें घाव देने की हिम्मत की ?" बच्चे के हाथों की हथेलियों पर नाखूनों के दो निशान थे, और दो नाखूनों के निशान उसके छोटे से पाँवों पर थे !

"किसने हिम्मत की, तुम्हें घाव देने की ?" दैत्य चिल्लाया, "मुझे बताओ, मैं एक बड़ी तलवार से उसे मार डालूँगा !"

"नहीं !" बच्चे ने उत्तर दिया,"लेकिन ये प्यार के घाव हैं !"

"तू कौन है ?" दैत्य ने पूछा, इसके साथ ही जाने क्यों उस पर एक भय सा व्याप्त हो गया, और वह छोटे बच्चे के सामने घुटनों के बल बैठ गया !

बच्चा दैत्य की तरफ देख हौले से मुस्कुराया और कहने लगा : "तुमने एक दिन मुझे अपने बगीचे में खिलाया था, आज तुम्हें मेरे साथ मेरे बगीचे में चलना चाहिए, जोकि स्वर्ग है !"

और तब, जब दोपहर को बच्चे बगीचे की तरफ भाग कर आये, पेड के नीचे उन्होंने दैत्य को मरा हुआ पाया, जिसे सफ़ेद फूलों की चादर ने ढाँप रखा था ! और ऊपर स्वर्ग से झाँकता दैत्य मंद-मंद मुस्कुरा रहा था !

< The End >
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Translator : Jogendra Singh (जोगेन्द्र सिंह 1977-Current) +91.9004044110
http://indotrans1.blogspot.com/
http://jogendrasingh.blogspot.com/

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Story : The Selfish Giant (Oscar Wilde 1854-1900)
Source : http://www.wilde-online.info/the-selfish-giant.html
Oscar Wilde - playwright, novelist, poet, critic
Born: October 16, 1854
Birthplace: Dublin, Ireland
Died: November 30, 1900 in Paris, France (cerebral meningitis)
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  1. gravatar

    # by कविता रावत - February 16, 2012 at 5:43 PM

    bahut hi sundar kahani... printout nikal liya hai maine.. bas bachhon ke exam hone ke baad sunaongi...aisi kahaniya bachhon ko bahut achhi lagti hain...prastuti ke liye sukriya..

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